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Sunday, July 31, 2011

........... ज़्यादा किस्मत वाले ....

मुझ से ज़्यादा किस्मत वाले 
मेरे मुंह के छाले

बुलबुलों की तरह हर तरफ निकल रहे हैं
बिना इजाज़त मुँह में पल रहे हैं
कुछ मीठा-तीखा सा दर्द दे रहे हैं 
आजकल, मुझ से पहले
हर चीज़ का स्वाद ले रहे हैं
मिर्च से इनकी पुरानी दुश्मनी है
नमक से भी इनकी कहाँ बनी है 

ज़बान, जो दातों से
बेवजह लड़ जाती है  
इनको आजकल दिन-रात सहलाती है
दर्द है, तो इनका काफ़ी ज़िक्र है
सबको इनकी ही फ़िक्र है
कोई समझाता है,
बारिश से इनका पुराना रिश्ता है
पर पेट के मामलों में
मुँह क्यों खिंचता है???
किसी का सुझाव है कत्था लगाओ
कोई कहता है ताज़ा दही पी जाओ
तीन-चार दिन के मेहमान हैं
जल्दी चले जायेंगे
निश्चिन्त रहो इस मौसम में
कई मर्तबा आयेंगे-जायेंगे
इस मौसम में मुझ पर
ये घोर अत्याचार है
पकोड़े-भजिये खाना दुश्वार,
चखना दूभर चटनी-अचार है
नथुनों को छेड़ती खुशबुओं का
मज़ा ले नहीं सकता 
मुँह पूरा खुलता नहीं,
गालियाँ दे नहीं सकता

मुँह के दरवाज़े पर डटे हैं,
मानो चुंगी-चौकी वाले
मुझ से ज़्यादा किस्मत वाले
साले.... मेरे मुँह के छाले