एक बूढ़ा बरगद मुझे अक्सर आवाज़ देता है
कुछ अनमना सा, कुछ उदास, जटायें लटकाए
बेतरतीब सी शाखों पर चंद पत्ते
आधे सूखे हुए आधे मुरझाये
एक तरफ से निकलती पगडंडियों को
देखता टकटकी लगाये
कोई राही काश मुझ तक भी आये
बहुत अरसा कहाँ हुआ जब
हर सरगर्मी का हिस्सा था
जिसके तले रोज़ इक नया किस्सा था
खेल के मैदान के दूसरे छोर पर अब
पंचायत का नया भवन बन गया है
ग्यारह कमरों का प्राइमरी स्कूल भी
पास ही तन गया है.
गाँव में गतिविधियाँ ही चंद हो गयी हैं,
शिक्षा अब दरवाज़ों में बंद हो गयी है
शाखें भी औकात से ज़्यादा बढ़ गयी हैं,
नीम-शीशम-कनेर से बेवजह उलझ गयी हैं
लच्छु नीचे चबूतरे पर खेला, बढ़ा हुआ
गोद में झूला है, आज कुल्हाड़ी लिए खड़ा है
श्यामू का कहना है -
"कोटर में हींग भरवा दो, फिर ४० दिन बाद
नीलाम करवा दो" . पूनम कहती है
"ये बारह-मास झड़ता है, दिन भर अब
बस कचरा ही करता है "
सूरज और गोपाल जो दिन-रात
बरगद के नीचे लोटते थे,
उनको वही चाँदनी अब खटकती है
बरगद के नीचे अब नींद कहाँ लगती है.
मीरा सिर्फ वट-अमावस पर याद करती है
इक कच्चे धागे की शपथ दे जाती है
और श्यामू की साल भर की उम्र ले जाती है.
पंडितजी कभी कभार इधर भटक जाते हैं
वचनों-प्रवचनों से शर्मिंदा कर जाते हैं.
पटवारी कहता है-
इधर से पक्का रास्ता आ रहा है और अब
ये बरगद गाँव के विकास में आड़े आ रहा है.
काटेंगे फिर खोद कर जड़ें भी निकाल देंगे
जटायें कुछ काम नहीं आतीं और
लकड़ियों के उपयोग में संस्कार आड़े आते हैं
अब इंतज़ार बहुत हुआ.
तना भी गलने लगा है, छाल बिखरने लगी हैं,
जटायें भी शिखर से उतर अब,
धरा चूमने मचलने लगी हैं.
अब और इंतज़ार क्यों
और पैरवी किस बात की?
ये मंज़र अब और ना देख पाऊंगा
मुझे अब बस जल्द कटवा दो, यहाँ से हटवा दो
आखिर कब तक बर्दाश्त कर पाऊंगा
अगली बारिश में वरना
ख़ुद-ब-ख़ुद उखड़ जाऊंगा

